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परीक्षा टिप्स: सारांश को 3-4 पैराग्राफ में याद रखें। “भोलानाथ” और “बाबू जी” का संबंध, खेल-धमाचौकड़ी, और अंत में माँ की शरण — यही तीन मुख्य बिंदु हैं।
🔹 भाग 1 — पिता-पुत्र का प्रेम
बचपन से ही भोलानाथ (तारकेश्वरनाथ) का संबंध अपने पिता (बाबू जी) से बहुत गहरा था। पिता उन्हें सुबह उठाकर नहला-धुलाकर पूजा में बिठाते, माथे पर भभूत का तिलक लगाते और प्यार से ‘भोलानाथ’ कहकर पुकारते। पिता के साथ गंगा स्नान, पेड़ पर झूलना, मछलियों को चारा देना — ये सब बचपन की अनमोल स्मृतियाँ हैं। माँ से नाता केवल दूध पीने तक सीमित था, इसलिए अधिकतर समय पिता की गोद में बीतता था।
🔹 भाग 2 — बचपन के खेल और मस्ती
भोलानाथ और उसके साथी गली में नाटक-घर बनाते, मिट्टी की दुकान लगाते, बरात निकालते, खेती करते, चिड़ियों को पकड़ते। कभी-कभी बाबू जी भी उनसे कुश्ती लड़ते और हँसते-हँसाते। माँ बड़े प्यार से खाना खिलाती और दही-भात की थाली में तोता, मैना, कबूतर आदि पक्षियों की आकृतियाँ बनाकर खिलाती। बच्चे जल्दी उड़ा देते, उड़ाने का मौका ही नहीं देते।
🔹 भाग 3 — साँप वाली घटना और माँ की शरण
एक दिन बच्चे टीले पर चूहे के बिल से पानी उलीचने लगे। गणेश जी के चूहे की रक्षा के लिए शिव जी का साँप निकल आया! सब बच्चे भयभीत होकर भागे — कोई गिरा, किसी का सिर फूटा, किसी के दाँत टूटे। सब लहूलुहान हो गए। भोलानाथ घर भागकर आया। उस समय बाबू जी बैठक में हुक्का पी रहे थे, पर भोलानाथ उनके पास न जाकर सीधे माँ की गोद में जा छिपा। माँ ने घाव पर हल्दी लगाई, अँचल से आँसू पोंछे, गले लगाया। बाबू जी भी दौड़े आए पर भोलानाथ ने माँ का अँचल नहीं छोड़ा। यही पाठ का सार है — विपदा में बच्चे को माँ की छाँव सबसे अधिक सुकून देती है।
मृदंगएक प्रकार का वाद्य यंत्र
तड़केप्रभात, सवेरे
ललाटमाथा, मस्तक
त्रिपुंडमाथे पर तीन आड़ी रेखाएँ (तिलक)
लिलारललाट, माथा
उतानपीठ के बल लेटना
गोरसदूध, दही, मट्ठा (मिलाकर)
अफरभर पेट से अधिक खा लेना
चँदोआछोटा शामियाना
ज्योनारभोज, दावत
जीमनेभोजन करना
अमोलेआम के उगते हुए पौधे
लाल ओहारपरदे के लिए डाला हुआ लाल कपड़ा
कसोरेमिट्टी के बने छिछले कटोरे
महतारीमाँ
ओसारेबरामदा
अमनियासाफ, शुद्ध (चावल)
चिरारीदीनतापूर्वक की जाने वाली प्रार्थना
सानकरमिलाना, गूँधना
बोथकरसराबोर कर देना
Q1प्रस्तुत पाठ के आधार पर यह कहा जा सकता है कि बच्चे का अपने पिता से अधिक जुड़ाव था, फिर भी विपदा के समय वह पिता के पास न जाकर माँ की शरण लेता है। आपकी समझ से इसकी क्या वजह हो सकती है?
उत्तर: यह सच है कि भोलानाथ का अधिकतर समय पिता के साथ बीतता था — पूजा में, गंगा स्नान में, खेल में। पिता उसके मित्र थे। परंतु माँ बच्चे की जन्मदात्री है, वात्सल्य की मूर्ति है। माँ का अँचल बच्चे को जन्म से ही सुरक्षा और ममता देता है। जब भोलानाथ साँप के डर से आतंकित हुआ, उसका बाल-मन सहज रूप से उस ओर भागा जहाँ सबसे अधिक सुरक्षा और प्रेम का अनुभव होता है — माँ की गोद। पिता के साथ खेल था, आनंद था; माँ के साथ भावनात्मक सुरक्षा थी। इसीलिए संकट में बच्चा पिता को नहीं, माँ को ढूँढता है।
Q2आपके विचार से भोलानाथ अपने साथियों को देखकर सिसकना क्यों भूल जाता है?
उत्तर: बच्चों का मन चंचल और वर्तमान में जीनेवाला होता है। जब भोलानाथ सिसक रहा होता है, उसी समय उसे बाहर से अपने साथियों का झुंड आता दिखता है। साथियों की आवाज़, उनकी उपस्थिति और खेल का आमंत्रण देखते ही उसका ध्यान रोने से हट जाता है और वह खेल की ओर खिंच जाता है। यह बाल-मनोविज्ञान का स्वाभाविक गुण है — बच्चे जल्दी दुख भूल जाते हैं और वातावरण से प्रभावित हो जाते हैं।
Q3भोलानाथ और उसके साथियों के खेल और खेलने की सामग्री आपके खेल और खेलने की सामग्री से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर: भोलानाथ के खेल: नाटक-घर बनाना, मिट्टी की दुकान लगाना, बरात निकालना, खेती करना, चिड़िया पकड़ना, घरौंदा बनाना, ज्योनार करना — ये सब प्राकृतिक और कल्पनाशील खेल थे। सामग्री — मिट्टी, तिनके, घड़े के टुकड़े, ठीकरे आदि। हमारे खेल: मोबाइल गेम्स, वीडियो गेम्स, क्रिकेट किट, बोर्ड गेम्स, खिलौने। अंतर: भोलानाथ के खेल प्रकृति से जुड़े थे, सामूहिक थे और कल्पनाशीलता विकसित करते थे। हमारे खेल तकनीक-आधारित और व्यक्तिगत हैं।
Q4पाठ में आए ऐसे प्रसंगों का वर्णन कीजिए जो आपके दिल को छू गए हों।
उत्तर: (i) माँ की गोद में शरण: जब साँप के डर से घायल भोलानाथ दौड़कर माँ की गोद में छिपता है और माँ रोते हुए उसे गले लगा लेती है — यह दृश्य अत्यंत हृदयस्पर्शी है। (ii) माँ का खाना खिलाना: माँ दही-भात में पक्षियों की आकृतियाँ बनाकर खिलाती है — यह ममता की अनूठी अभिव्यक्ति है। (iii) पिता का बच्चों के साथ खेलना: पिता का हँसते-हँसाते बच्चों के साथ कुश्ती लड़ना और घरौंदे बनाकर जीमने बैठ जाना — यह पिता के प्रेम की मार्मिक झलक है।
Q5इस उपन्यास अंश में तीस के दशक की ग्राम्य संस्कृति का चित्रण है। आज की ग्रामीण संस्कृति में आपको किस तरह के परिवर्तन दिखाई देते हैं?
उत्तर: तब: बच्चे मिट्टी के खेल खेलते, प्रकृति से जुड़े थे, संयुक्त परिवार था, धार्मिक परंपराएँ जीवित थीं, मनोरंजन के साधन सीमित पर स्वाभाविक थे। अब: मोबाइल-इंटरनेट का प्रभाव, एकल परिवार, बच्चे घर में बंद, प्राकृतिक खेल लुप्त हो रहे हैं, ग्रामीण भी शहरी जीवनशैली अपना रहे हैं। धार्मिक परंपराओं में भी बदलाव आया है। हालाँकि कुछ मूल्य जैसे माँ का प्रेम आज भी अपरिवर्तित हैं।
Q6यहाँ माता-पिता का बच्चे के प्रति जो वात्सल्य व्यक्त हुआ है उसे अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर: पिता का वात्सल्य: बाबू जी भोलानाथ को सुबह उठाते, नहलाते-धुलाते, पूजा में बिठाते, माथे पर तिलक लगाते। गंगा किनारे कंधे पर बिठाकर झुलाते। कुश्ती लड़कर हँसाते। बच्चों का घरौंदा बिगाड़ने में आनंद लेते। माँ का वात्सल्य: जबरदस्ती तेल लगाना, पक्षियों की आकृतियाँ बनाकर खाना खिलाना, संकट में अँचल में छिपाना, घाव पर हल्दी लगाना, अँचल से आँसू पोंछना, गले लगाना — दोनों का प्रेम अतुलनीय है।
Q7‘माता का अँचल’ शीर्षक की उपयुक्तता बताते हुए कोई अन्य शीर्षक सुझाइए।
उत्तर: उपयुक्तता: ‘माता का अँचल’ शीर्षक पूर्णतः सार्थक है क्योंकि पूरी कहानी में बच्चे का पिता से अधिक जुड़ाव दिखाया गया है, परंतु अंत में जब असली संकट आता है तो वह माँ के अँचल में शरण लेता है। अँचल = माँ का प्यार, सुरक्षा, छाया। यही पाठ का केंद्रीय संदेश है। वैकल्पिक शीर्षक: (1) माँ की छाया, (2) बचपन की यादें, (3) माँ का आँचल ही शरण, (4) भोलानाथ की दुनिया।
Q8बच्चे माता-पिता के प्रति अपने प्रेम को कैसे अभिव्यक्त करते हैं?
उत्तर: बच्चे अपना प्रेम अनेक तरीकों से व्यक्त करते हैं — गले लगना, गोद में बैठना, साथ खेलना, साथ रहने की जिद करना, बात-बात पर माता-पिता को बुलाना, उनके साथ खाना खाना। इस पाठ में भोलानाथ पिता की गोद में सोता है, साथ पूजा करता है, साथ गंगा जाता है। माँ की भी हर बात मानता है। संकट में माँ की शरण लेना — यही बच्चे का सबसे बड़ा प्रेम-प्रदर्शन है।
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नोट: ये प्रश्न विभिन्न परीक्षाओं में पूछे गए हैं। इन्हें अच्छे से याद करें।
PYQ ⭐भोलानाथ के पिता उससे किस प्रकार का व्यवहार करते थे? पाठ के आधार पर लिखिए।
बाबू जी एक आदर्श पिता और बाल-मित्र दोनों थे। वे भोलानाथ को सुबह उठाकर नहला-धुलाकर पूजा में साथ बिठाते, माथे पर त्रिपुंड का तिलक लगाते। गंगा जी के तट पर ले जाते, मछलियों को चारा देते, पेड़ों पर झुलाते। कभी-कभी उससे कुश्ती भी लड़ते — जान-बूझकर हारते और हँसते। रामनाम पाठ करते, बच्चे के खेल में भी भाग लेते। उनका प्रेम निस्वार्थ और अत्यंत मधुर था।
PYQ ⭐‘माता का अँचल’ पाठ में बच्चों के खेलों का जो वर्णन है, वह आपकी दृष्टि में आज के बच्चों के खेलों से किस प्रकार भिन्न है?
भोलानाथ और उसके साथी मिट्टी और प्रकृति से जुड़े खेल खेलते थे — नाटक-घर, बरात, मिट्टी की दुकान, खेती, घरौंदा। ये सामूहिक, स्वाभाविक और कल्पनाशील खेल थे। आज के बच्चे अधिकतर मोबाइल, वीडियो गेम, टेलीविजन में व्यस्त हैं। उनके खेल तकनीकी और एकाकी हैं। शारीरिक श्रम कम है, कल्पनाशीलता सीमित है। पहले के खेलों में सामाजिकता और प्राकृतिक रचनात्मकता थी, आज के खेल आभासी दुनिया तक सिमट गए हैं।
PYQ ⭐साँप वाली घटना का वर्णन कीजिए और उस समय भोलानाथ ने क्या किया?
एक दिन भोलानाथ और उसके साथी एक टीले पर गए और वहाँ चूहे के बिल में से पानी उलीचने लगे। तभी बिल से एक साँप निकल आया — जैसे गणेश जी के चूहे की रक्षा के लिए शिव जी का साँप आया हो। साँप देखकर सभी बच्चे भागने लगे। भागते-गिरते बच्चों के सिर फूटे, दाँत टूटे, सब लहूलुहान हो गए। भोलानाथ भी घर की ओर भागा। बाबू जी बैठक में थे, पर वह उनकी ओर न जाकर सीधे माँ की गोद में जा छिपा। माँ ने उसे अँचल में छिपाया, हल्दी लगाई, गले लगाया।
PYQ ⭐पाठ में माँ द्वारा खाना खिलाने का वर्णन है। उस दृश्य को अपने शब्दों में लिखिए।
माँ भोलानाथ को बड़े प्यार से खाना खिलाती थी। वह थाली में दही-भात लेकर उसमें तोता, मैना, कबूतर, हंस, मोर आदि पक्षियों की आकृतियाँ बनाती और उनके नाम से चिड़िया बनाकर खिलाती। कहती — जल्दी खा लो नहीं तो उड़ जाएँगी। पर बच्चे इतनी जल्दी खा जाते कि उड़ने का मौका ही नहीं मिलता। यह दृश्य माँ की रचनात्मक ममता और बच्चे के भोलेपन का अनूठा संगम है।
PYQ ⭐पाठ के अंत में बाबू जी भी दौड़कर आते हैं, फिर भी भोलानाथ माँ का अँचल नहीं छोड़ता — इसका क्या तात्पर्य है?
इसका तात्पर्य यह है कि माँ का प्रेम सर्वोच्च और सबसे सुरक्षित आश्रय है। पिता से चाहे जितना लगाव हो, संकट में बच्चे को माँ की ममता और छाया में जो सुकून मिलता है वह अन्यत्र नहीं मिलता। माँ का अँचल सुरक्षा, प्रेम और शांति का प्रतीक है। जब बाबू जी आकर भोलानाथ को गोद में लेने लगे, तो भोलानाथ ने माँ का अँचल नहीं छोड़ा — यह बाल-मनोविज्ञान और मातृ-प्रेम की सर्वोच्चता को दर्शाता है। शीर्षक ‘माता का अँचल’ की सार्थकता भी यहीं सिद्ध होती है।
PYQ ⭐भोलानाथ का असली नाम क्या था और उसे यह नाम क्यों पड़ा?
भोलानाथ का असली नाम ‘तारकेश्वरनाथ’ था। उसके पिता उसे प्यार से ‘भोलानाथ’ कहकर पुकारते थे। भभूत का तिलक लगाने, पूजा में साथ बैठाने और भोले-भाले स्वभाव के कारण वह ‘भोलानाथ’ — अर्थात् भगवान शिव की तरह भोला — कहलाया। वह खुद भी अपने पिता को ‘बाबू जी’ और माँ को ‘मइयाँ’ कहकर पुकारता था।