
साथियों नमस्कार Board exam world में आपका स्वागत है, आज हम इस चैप्टर में जैव प्रक्रम के बारे में संपूर्ण अध्ययन करेंगे।जो आपके बुक में chapter 5 हैं।
सोचो — जब हम सो रहे होते हैं तब भी हमारा शरीर काम करता रहता है। दिल धड़कता है, साँस चलती है, खाना पचता है। ये सब जैव प्रक्रम हैं।
- जीव की संरचना सुसंगठित होती है — उसे बनाए रखने के लिए ऊर्जा चाहिए
- ऊर्जा का स्रोत → भोजन
- ऊर्जा के लिए ऑक्सीजन ज़रूरी → इसे लेने की प्रक्रिया = श्वसन
- उत्पन्न अपशिष्ट बाहर निकालना = उत्सर्जन
- सब जगह पहुँचाना = वहन
जब हम साइकिल चलाते हैं या सीढ़ियाँ चढ़ते हैं, हम ऊर्जा खर्च करते हैं। यह ऊर्जा भोजन से आती है। पोषण इसी भोजन को प्राप्त करने की प्रक्रिया है।
इस प्रक्रिया में 3 चीज़ें होती हैं:
- क्लोरोफिल द्वारा प्रकाश ऊर्जा का अवशोषण
- प्रकाश ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में बदलना + जल का विखंडन
- CO₂ का कार्बोहाइड्रेट में अपचयन
पत्ती की अनुप्रस्थ काट में हरे बिंदु = क्लोरोप्लास्ट
| प्रकार | उदाहरण | तरीका |
|---|---|---|
| शाकाहारी | गाय, बकरी | पौधे खाते हैं |
| माँसाहारी | शेर, बाघ | जानवर खाते हैं |
| सर्वाहारी | मनुष्य, कुत्ता | दोनों खाते हैं |
| परजीवी | अमरबेल, जूँ | दूसरे से पोषण लेते हैं |
| मृतोपजीवी | फफूँदी, यीस्ट | मृत जीवों से पोषण |
आहार नाल — मुँह से गुदा तक एक लंबी नली। भोजन इसी से गुजरता है।
| अंग | एंज़ाइम / रस | क्या पचता है? |
|---|---|---|
| मुँह | लार (एमाइलेज़) | स्टार्च → माल्टोज़ |
| आमाशय | HCl + पेप्सिन | प्रोटीन का आंशिक पाचन |
| यकृत | पित्त रस | वसा का इमल्सीकरण |
| अग्न्याशय | ट्रिप्सिन, लाइपेज़ | प्रोटीन + वसा |
| क्षुद्रांत्र | आँत रस | पूर्ण पाचन + अवशोषण |
| बृहदांत्र | — | जल का अवशोषण |
| वायवीय श्वसन | अवायवीय श्वसन |
|---|---|
| ऑक्सीजन की उपस्थिति में | ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में |
| CO₂ + H₂O बनते हैं | लैक्टिक अम्ल / एथेनॉल बनता है |
| अधिक ऊर्जा — 38 ATP | कम ऊर्जा — 2 ATP |
| माइटोकॉन्ड्रिया में | कोशिकाद्रव्य में |
| उदाहरण: हम | उदाहरण: यीस्ट, पेशी कोशिका |
ADP + फॉस्फेट + ऊर्जा → ATP
- कूपिका (Alveoli) — फुफ्फुस में लाखों छोटी थैलियाँ, O₂-CO₂ का आदान-प्रदान यहीं होता है
- कूपिका की सतह को फैलाएँ तो लगभग 80 वर्ग मीटर होगी
- हीमोग्लोबिन — लाल रुधिर कणिकाओं में, O₂ का वहन करता है
- CO₂ रुधिर में घुलित अवस्था में वहन होती है
रुधिर में — प्लाज़्मा (तरल), लाल रुधिर कणिकाएँ (O₂ वहन), श्वेत रुधिर कणिकाएँ (रोग से लड़ना), प्लेटलेट्स (थक्का जमाना)।
- दोहरा परिसंचरण — एक चक्र में रुधिर दो बार हृदय से गुज़रता है
- धमनियाँ — हृदय से शरीर को रुधिर ले जाती हैं (मोटी भित्ति)
- शिराएँ — शरीर से हृदय को रुधिर लाती हैं
- केशिकाएँ — सबसे पतली, पदार्थों का विनिमय यहीं होता है
- सामान्य रक्तदाब = 120/80 mm Hg
| ऊतक | क्या वहन करता है? | दिशा |
|---|---|---|
| जाइलम | जल + खनिज लवण | जड़ → पत्ती (ऊपर) |
| फ्लोएम | भोजन (सुक्रोज़) | दोनों दिशाएँ |
मनुष्य में नाइट्रोजनी अपशिष्ट → यूरिया — यकृत में बनता है, वृक्क छानकर मूत्र के रूप में निकालते हैं।
एक वृक्क में लाखों नेफ्रॉन होते हैं।
नेफ्रॉन में प्रक्रिया:
- रुधिर से प्राथमिक निस्यंद → बोमन संपुट में छनता है
- उपयोगी पदार्थों (ग्लूकोज़, अमीनो अम्ल, जल) का पुनरावशोषण
- शेष → मूत्र → मूत्रवाहिनी → मूत्राशय → बाहर
- CO₂ + O₂ — विसरण द्वारा रंध्रों से बाहर
- अतिरिक्त जल — वाष्पोत्सर्जन द्वारा
- अपशिष्ट पदार्थ — पुरानी पत्तियों के गिरने पर
- गोंद, रेजिन — जाइलम में संचित
- कोशिका रिक्तिका में भी अपशिष्ट जमा रहते हैं
📌 आपने क्या सीखा
- जीवन की गतियाँ → जैव प्रक्रम → पोषण, श्वसन, वहन, उत्सर्जन
- स्वपोषी — खुद भोजन बनाते हैं (प्रकाश संश्लेषण)
- विषमपोषी — दूसरों से भोजन लेते हैं
- मनुष्य में पाचन — मुँह से गुदा तक, एंज़ाइम द्वारा
- वायवीय श्वसन → अधिक ऊर्जा | अवायवीय → कम ऊर्जा
- मानव हृदय — 4 कक्ष, दोहरा परिसंचरण
- पादप — जाइलम (जल), फ्लोएम (भोजन) वहन करते हैं
- वृक्क — नेफ्रॉन द्वारा मूत्र बनाते हैं
CBSE Board Exam — Chapter 5: जैव प्रक्रम
(c) उत्सर्जन — वृक्क उत्सर्जन तंत्र का मुख्य अंग है। यह रुधिर से यूरिया जैसे नाइट्रोजनी अपशिष्ट छानकर मूत्र बनाता है।
(a) जल का वहन — जाइलम जड़ों से पत्तियों तक जल एवं खनिज लवणों का वहन करता है। फ्लोएम भोजन का वहन करता है।
(d) उपरोक्त सभी — प्रकाश संश्लेषण के लिए CO₂, H₂O, क्लोरोफिल और सूर्य का प्रकाश — ये चारों ज़रूरी हैं।
(b) माइटोकॉन्ड्रिया — वायवीय श्वसन में पायरुवेट का पूर्ण विखंडन माइटोकॉन्ड्रिया में होता है जिससे CO₂, H₂O और अधिक ऊर्जा (38 ATP) मिलती है।
| स्वपोषी | विषमपोषी |
|---|---|
| खुद भोजन बनाते हैं | दूसरों पर निर्भर |
| क्लोरोफिल होता है | क्लोरोफिल नहीं |
| पेड़-पौधे | जानवर, फफूँदी, मनुष्य |
O₂ का वहन: फुफ्फुस की कूपिकाओं से रुधिर में आती है → हीमोग्लोबिन से जुड़कर ऑक्सीहीमोग्लोबिन बनाती है → सभी कोशिकाओं तक पहुँचती है।
CO₂ का वहन: कोशिकाओं से CO₂ → रुधिर में घुलित अवस्था में (बाइकार्बोनेट के रूप में) → फुफ्फुस → बाहर।
| वायवीय | अवायवीय |
|---|---|
| O₂ की उपस्थिति | O₂ की अनुपस्थिति |
| CO₂ + H₂O बनता है | एथेनॉल / लैक्टिक अम्ल |
| 38 ATP | 2 ATP |
अवायवीय जीव: यीस्ट, कुछ जीवाणु। हमारी पेशी कोशिकाएँ भी कभी-कभी अवायवीय श्वसन करती हैं।
वसा का पाचन मुख्यतः क्षुद्रांत्र में होता है।
- यकृत से पित्त रस आता है → वसा की बड़ी गोलिकाओं को छोटी गोलिकाओं में तोड़ता है (इमल्सीकरण)
- अग्न्याशय से लाइपेज़ एंज़ाइम → वसा को वसा अम्ल + ग्लिसरॉल में तोड़ता है
- पचा हुआ वसा → दीर्घरोम (Villi) द्वारा अवशोषित → लसिका में जाता है
- लार में एमाइलेज़ (एमाइलिन) एंज़ाइम होता है जो स्टार्च को माल्टोज़ में बदलता है
- लार भोजन को गीला और मुलायम बनाती है ताकि निगलना आसान हो
- यह भोजन को गोली जैसे आकार (बोलस) में बदलती है
स्थलीय जीव को लाभ:
- वायुमंडलीय ऑक्सीजन जल में घुली ऑक्सीजन से बहुत अधिक होती है
- स्थलीय जीव सीधे वायु से O₂ लेते हैं — आसानी से उपलब्ध
- जलीय जीव को जल में घुली O₂ के लिए अधिक परिश्रम करना पड़ता है
- इसीलिए मछली बहुत तेज़ी से मुँह खोलती-बंद करती है
मानव वहन तंत्र के घटक: हृदय, रुधिर और रुधिर वाहिकाएँ।
| घटक | कार्य |
|---|---|
| हृदय (4 कक्ष) | रुधिर को पंप करना, दोहरा परिसंचरण |
| लाल रुधिर कणिकाएँ | O₂ का वहन (हीमोग्लोबिन द्वारा) |
| श्वेत रुधिर कणिकाएँ | रोग से लड़ना (प्रतिरक्षा) |
| प्लेटलेट्स | रक्त का थक्का बनाना |
| प्लाज़्मा | भोजन, CO₂, हार्मोन, अपशिष्ट का वहन |
| धमनियाँ | हृदय से अंगों तक रुधिर |
| शिराएँ | अंगों से हृदय तक रुधिर |
| केशिकाएँ | पदार्थों का विनिमय |
| लसिका | वसा + प्रोटीन का वहन |
नेफ्रॉन की रचना:
- बोमन संपुट — प्याले जैसी संरचना, रुधिर का प्राथमिक छनन यहाँ
- वृक्काणु नलिका — लंबी नली, पुनरावशोषण होता है
- संग्राहक वाहिनी — मूत्र एकत्र करती है
क्रियाविधि — 3 चरण:
- निस्यंदन: उच्च दाब पर रुधिर बोमन संपुट में छनता है → ग्लूकोज़, अमीनो अम्ल, यूरिया, जल सब छन जाते हैं
- पुनरावशोषण: उपयोगी पदार्थ (ग्लूकोज़, अमीनो अम्ल, जल की अधिकांश मात्रा) वापस रुधिर में आ जाते हैं
- मूत्र निर्माण: शेष विलय (यूरिया + अतिरिक्त जल + लवण) → मूत्र → मूत्रवाहिनी → मूत्राशय → बाहर
| कूपिका (Alveoli) | नेफ्रॉन (Nephron) |
|---|---|
| फुफ्फुस में | वृक्क में |
| गैसों का विनिमय | रुधिर का छनन + मूत्र निर्माण |
| रुधिर वाहिकाओं से घिरी | रुधिर वाहिकाओं से घिरी |
| सतह क्षेत्रफल ≈ 80 m² | लाखों नेफ्रॉन मिलकर अधिक सतह |
| O₂ अंदर, CO₂ बाहर | यूरिया + अपशिष्ट → मूत्र बाहर |
| पतली भित्ति — विसरण आसान | पतली भित्ति — छनन आसान |
समानता: दोनों में विस्तृत सतह, पतली भित्ति और रुधिर केशिकाओं का जाल होता है — यही कुशल कार्य का रहस्य है।
आवश्यक परिस्थितियाँ:
- सूर्य का प्रकाश
- क्लोरोफिल (क्लोरोप्लास्ट में)
- CO₂ (वायु से, रंध्रों द्वारा)
- जल (जड़ों से जाइलम द्वारा)
उत्पाद: ग्लूकोज़ (C₆H₁₂O₆) + ऑक्सीजन + जल
क्रियाविधि — 3 चरण:
- प्रकाश अवशोषण: क्लोरोफिल सूर्य की ऊर्जा अवशोषित करता है
- जल का विखंडन + ऊर्जा रूपांतरण: प्रकाश ऊर्जा → रासायनिक ऊर्जा (ATP), जल → H⁺ + O₂
- CO₂ का कार्बोहाइड्रेट में अपचयन: ATP की ऊर्जा से CO₂ → ग्लूकोज़
दोहरा परिसंचरण: एक चक्र में रुधिर दो बार हृदय से गुज़रता है।
- फुफ्फुस परिसंचरण: हृदय → फुफ्फुस (CO₂ छोड़ना, O₂ लेना) → हृदय
- दैहिक परिसंचरण: हृदय → शरीर के सभी अंग (O₂ देना, CO₂ लेना) → हृदय
क्यों आवश्यक है:
- O₂युक्त और CO₂युक्त रुधिर कभी नहीं मिलते — उच्च दक्षता
- पक्षियों और स्तनधारियों जैसे उच्च ऊर्जा वाले जीवों को यह ज़रूरी है
- शरीर का ताप नियमन बना रहता है
class 10 chapter 1 हिंदी नोट्स : Click here
class 10 chapter 2 हिंदी नोट्स : Click here
class 10 chapter 3 हिंदी नोट्स : Click here
class 10 chapter 4 हिंदी नोट्स : Click here