
📢 UP Board Exam 2026 — यह पूरी कहानी पढ़ो!
एक कहानी यह भी पाठ से 10-12 नंबर के प्रश्न आते हैं। शुरू से अंत तक पूरी कहानी पढ़ो — सवालों के जवाब खुद याद हो जाएंगे! 🎯
मन्नू भंडारी — एक कहानी यह भी
पूरी कहानी Summary • चरित्र • MCQ • Q&A • Board Exam 2026
दोस्तों, Class 10 Hindi Chapter 10 मन्नू भंडारी की आत्मकथात्मक रचना एक कहानी यह भी बहुत भावपूर्ण पाठ है। यह पाठ लेखिका के बचपन से लेकर कॉलेज तक की पूरी यात्रा है। नीचे पूरी कहानी आसान भाषा में दी गई है — पहले पढ़ो फिर सवाल देखो।
✍️ लेखिका परिचय — मन्नू भंडारी
| जानकारी | विवरण |
|---|---|
| जन्म | 1931 ई. (भानपुरा, मध्य प्रदेश) |
| मृत्यु | 2021 ई. |
| विधा | कहानी, उपन्यास, आत्मकथा |
| प्रमुख रचना | आपका बंटी, महाभोज, यही सच है |
| पति | राजेंद्र यादव (हंस पत्रिका के संपादक) |
| विशेषता | नारी मन की कुशल चित्रकार |
📖 पूरी कहानी — शुरू से अंत तक
दोस्तों यह पाठ मन्नू भंडारी की खुद की जीवनी है। वे अपने बचपन से लेकर कॉलेज तक की यात्रा बता रही हैं। आइए एक-एक घटना को समझते हैं।
🏠 भाग 1 — अजमेर का घर और परिवार
मन्नू भंडारी का जन्म मध्य प्रदेश के भानपुरा में हुआ था। लेकिन उनकी यादें अजमेर के ब्रह्मपुरी मोहल्ले से शुरू होती हैं। वहाँ एक दो-मंजिला मकान था जिसकी ऊपरी मंजिल पर पिताजी का साम्राज्य था। वहाँ किताबें, पत्र-पत्रिकाएं और अखबार बिखरे रहते थे। नीचे माँ और सभी भाई-बहन रहते थे।
👨 भाग 2 — पिताजी का व्यक्तित्व
पिताजी बहुत जटिल इंसान थे। अजमेर से पहले वे इंदौर में रहते थे जहाँ उनकी बड़ी प्रतिष्ठा थी। कांग्रेस के साथ-साथ वे समाज-सुधार के कामों से भी जुड़े थे। शिक्षा के वे केवल उपदेश ही नहीं देते थे — घर में आठ-दस विद्यार्थियों को पढ़ाते भी थे।
एक बड़े आर्थिक झटके के कारण वे इंदौर से अजमेर आ गए। वहाँ उन्होंने अपने बल-बूते पर अंग्रेजी-हिंदी शब्दकोश (विषयवार) बनाना शुरू किया जो अपनी तरह का पहला और अकेला शब्दकोश था। इससे यश तो मिला पर अर्थ नहीं।
👩 भाग 3 — माँ का व्यक्तित्व
माँ बेपढ़ी-लिखी थीं लेकिन धरती से कुछ ज्यादा ही धैर्य और सहनशक्ति थी उनमें। पिताजी की हर ज्यादती को अपना प्राप्य और बच्चों की हर फरमाइश को अपना फर्ज समझकर सहज भाव से स्वीकार करती थीं।
उन्होंने जिंदगी भर अपने लिए कुछ माँगा नहीं, चाहा नहीं — केवल दिया ही दिया। लेखिका माँ से बहुत प्यार करती थीं लेकिन उनकी मजबूरी में लिपटा त्याग कभी उनका आदर्श नहीं बन सका।
👧 भाग 4 — लेखिका का बचपन
मन्नू भंडारी पाँच भाई-बहनों में सबसे छोटी थीं। बड़ी बहन सुशीला के साथ घर के बड़े आँगन में सतोलिया, लँगड़ी-टाँग, पकड़म-पकड़ाई, काली-टीलो जैसे खेल खेलतीं। उस जमाने में घर की दीवारें पूरे मोहल्ले तक फैली थीं — किसी के भी घर में जाने पर पाबंदी नहीं थी।
लेखिका काली थीं और बहुत दुबली-पतली भी। गोरी रंग की बड़ी बहन सुशीला से हर बात में तुलना होती। इसी हीन-भावना ने उनके भीतर एक ग्रंथि पैदा कर दी — नाम, सम्मान और प्रतिष्ठा पाने के बावजूद आज तक वे उससे उबर नहीं पाईं।
💡 महत्वपूर्ण बात
लेखिका कहती हैं — “शायद अचेतन की किसी परत के नीचे दबी इसी हीन-भावना के चलते मैं अपनी किसी भी उपलब्धि पर भरोसा नहीं कर पाती — सब कुछ मुझे तुक्का ही लगता है।”
🎓 भाग 5 — नई शुरुआत: वजूद का एहसास
सन् 1944 में बड़ी बहन सुशीला की शादी हो गई और वे कोलकाता चली गईं। दोनों बड़े भाई भी आगे पढ़ाई के लिए बाहर चले गए। इन लोगों की छत्र-छाया के हटते ही पहली बार लेखिका को नए सिरे से अपने वजूद का एहसास हुआ।
पिताजी का ध्यान पहली बार उन पर केंद्रित हुआ। लड़कियों को जिस उम्र में गृहिणी और पाक-शास्त्री बनाया जाता था — पिताजी का आग्रह था कि वे रसोई से दूर रहें। रसोई को वे “भटियारखाना” कहते थे।
📚 भाग 6 — शीला अग्रवाल और साहित्य की दुनिया
सन् 1945 में दसवीं पास करके जब वे “फर्स्ट इयर” में आईं तो हिंदी की प्राध्यापिका शीला अग्रवाल से परिचय हुआ। वे सावित्री गर्ल्स हाई स्कूल में नियुक्त हुई थीं।
शीला अग्रवाल ने साहित्य की दुनिया से परिचय करवाया — खुद चुन-चुनकर किताबें दीं। जैनेंद्र, अज्ञेय, यशपाल, भगवतीचरण वर्मा तक साहित्य की दुनिया फैल गई। जैनेंद्र जी की छोटी-छोटी सरल-सहज वाक्यों वाली शैली ने बहुत आकृष्ट किया।
शीला अग्रवाल ने केवल साहित्य का दायरा ही नहीं बढ़ाया — बल्कि घर की चारदीवारी के बीच बैठकर देश की स्थितियों को जानने की जो सिलसिला पिताजी ने शुरू किया था — उन्होंने उसे स्थितियों की सक्रिय भागीदारी में बदल दिया।
✊ भाग 7 — आंदोलन में भागीदारी
सन् 1946-47 के दिन। प्रभात-फेरियाँ, हड़तालें, जुलूस, भाषण — हर शहर का चरित्र था। लेखिका भी इसमें कूद पड़ीं। हाथ उठा-उठाकर नारे लगाना, हड़तालें करवाना, लड़कों के साथ शहर की सड़कें नापना।
एक बार कॉलेज से प्रिंसिपल का पत्र आया कि पिताजी आकर मिलें। मेरी गतिविधियों के कारण मेरे खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए। पत्र पढ़ते ही पिताजी आग-बबूला हो गए — “यह लड़की मुझे कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रखेगी।”
लेखिका डरते-डरते घर गईं। लेकिन पिताजी के एक अंतरंग मित्र डॉ. अंबालाल जी वहाँ बैठे थे। डॉ. अंबालाल ने लेखिका को देखते ही गर्मजोशी से स्वागत किया — “आई एम रिअली प्राउड ऑफ यू!” और पिताजी को बधाई देने चले आए।
पिताजी जो मुँह दिखाने से घबरा रहे थे — वे बड़े गर्व से कहकर आए कि “यह तो पूरे देश की पुकार है — इस पर कोई कैसे रोक लगा सकता है भला?” — पिताजी के चेहरे का संतोष धीरे-धीरे गर्व में बदलता जा रहा था!
✊ भाग 8 — आजाद हिंद फौज का मुकदमा
एक घटना और। आजाद हिंद फौज के मुकदमे का सिलसिला था। सभी कॉलेजों, स्कूलों, दुकानों के लिए हड़ताल का आह्वान था। शाम को अजमेर का पूरा विद्यार्थी-वर्ग चौपड़ (मुख्य बाजार का चौराहा) पर इकट्ठा हुआ और जमकर भाषणबाजी हुई।
पिताजी के एक दकियानूसी मित्र ने घर आकर पिताजी की लू उतारी — “अरे उस मन्नू की तो मति मारी गई है। भंडारी जी आपको क्या हुआ? आपने लड़कियों को आजादी दी पर देखते आप — जाने कैसे-कैसे उलटे-सीधे लड़कों के साथ हड़तालें करवाती, हुड़दंग मचाती फिर रही है। हमारे-आपके घरों की लड़कियों को यह शोभा देता है?”
वे तो आग लगाकर चले गए और पिताजी सारे दिन भभकते रहे — “बस, अब यही रह गया है कि लोग घर आकर थू-थू करके चले जाएँ। बंद करो अब इस मन्नू का घर से बाहर निकलना।”
लेकिन रात को जब लेखिका लौटीं तो पिताजी के अंतरंग मित्र डॉ. अंबालाल जी बैठे थे। उन्होंने गर्मजोशी से स्वागत किया और पिताजी को “आई एम रिअली प्राउड ऑफ यू” कहकर बधाई दी। पिताजी का गुस्सा गर्व में बदल गया!
💭 भाग 9 — लेखिका की समझ और अंत
आज पीछे मुड़कर देखती हैं तो समझ आता है — पिताजी में कितने अंतर्विरोध थे। एक ओर ‘विशिष्ट’ बनने और बनाने की प्रबल लालसा तो दूसरी ओर अपनी सामाजिक छवि के प्रति भी उतनी ही सजगता।
आज एकाएक लेखिका को अपने खंडित विश्वासों की व्यथा के नीचे पिताजी के शक्की स्वभाव की झलक दिखाई देती है। वे कहती हैं — “समय का प्रवाह भले ही हमें दूसरी दिशाओं में बहाकर ले जाए — स्थितियों का दबाव भले ही हमारा रूप बदल दे — हम पूरी तरह उससे मुक्त तो नहीं ही हो सकते!”
📝 पाठ का सार — एक नजर में
| घटना | महत्व |
|---|---|
| अजमेर का ब्रह्मपुरी मोहल्ला | यादों की शुरुआत |
| पिताजी का शब्दकोश बनाना | यश मिला पर अर्थ नहीं |
| सुशीला की शादी + भाइयों का जाना | वजूद का पहला एहसास |
| रसोई को “भटियारखाना” कहना | पिताजी की प्रगतिशील सोच |
| शीला अग्रवाल से मुलाकात | साहित्य और आंदोलन से जुड़ाव |
| प्रिंसिपल का पत्र | पिताजी का गुस्से से गर्व में बदलना |
| आजाद हिंद फौज का मुकदमा | लेखिका की राजनीतिक भागीदारी |
| डॉ. अंबालाल की बधाई | पिताजी का गर्व |
🎭 प्रमुख पात्रों का चरित्र
👨 पिताजी का चरित्र:
- महत्वाकांक्षी: यश-लिप्सा उनके जीवन की धुरी थी।
- शक्की स्वभाव: विश्वासघात की व्यथा से शक्की बने।
- अंतर्विरोधी: एक तरफ कठोर, दूसरी तरफ प्रेरणादायक।
- प्रगतिशील: रसोई से दूर रखा — पढ़ाई पर जोर दिया।
- राष्ट्रप्रेमी: देश की बातों में रुचि, बहसें करते थे।
- अहंवादी: अपनी छवि की बहुत परवाह करते थे।
👩 माँ का चरित्र:
- त्यागमयी: अपने लिए कभी कुछ नहीं माँगा।
- धैर्यशील: सब सहती रहीं — कभी शिकायत नहीं।
- बेपढ़ी-लिखी: पर व्यवहार में बहुत समझदार।
🎓 शीला अग्रवाल का चरित्र:
- हिंदी की प्राध्यापिका — प्रेरणादायक।
- साहित्य की दुनिया से परिचय करवाया।
- देश की राजनीतिक गतिविधियों में भागीदारी दिलाई।
- लेखिका के व्यक्तित्व निर्माण में सबसे बड़ा योगदान।
🔑 कठिन शब्दों के अर्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| कुंठा | मन की दबी हुई इच्छा, घुटन |
| अहंवादी | घमंडी |
| भगनावशेष | खंडहर, टूटे-फूटे हिस्से |
| विस्फारित | और अधिक फैलाना |
| आक्रांत | कष्टग्रस्त |
| निषिद्ध | जिस पर रोक लगाई गई हो |
| वर्चस्व | दबदबा |
| भटियारखाना | सराय, यहाँ रसोई को कहा गया |
| प्रतिच्छाया | परछाईं, प्रतिबिंब |
| वजूद | अस्तित्व, पहचान |
| छत्र-छाया | संरक्षण, देखभाल |
| यश-लिप्सा | यश पाने की तीव्र इच्छा |
| महाभोज | मन्नू भंडारी का प्रसिद्ध उपन्यास |
| दकियानूसी | पुराने विचारों वाला |
📝 Board Exam 2026 — महत्वपूर्ण Q&A
📝 2 अंक के प्रश्न
📝 5 अंक के प्रश्न
1. पिताजी: उनसे राष्ट्रप्रेम, विद्या की लगन और आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली। साथ ही उनकी शक्की प्रवृत्ति भी अनजाने में लेखिका में उतर गई।
2. माँ: माँ का त्याग और सहनशीलता देखी। हालाँकि यह उनका आदर्श नहीं बन सका लेकिन माँ की ममता ने उन्हें मजबूत बनाया।
3. बड़ी बहन सुशीला: उनसे तुलना ने हीन-भावना पैदा की जो आज तक है।
4. शीला अग्रवाल: साहित्य और राजनीतिक चेतना दी — सबसे बड़ा योगदान।
5. मोहल्ले के लोग: मोहल्ले के पात्रों ने उनकी कहानियों को जन्म दिया।
1. शीला अग्रवाल की प्रेरणा से वे राजनीतिक गतिविधियों में शामिल हुईं।
2. हाथ उठाकर नारे लगाना, हड़तालें करवाना, जुलूस निकालना।
3. आजाद हिंद फौज के मुकदमे के समय हड़ताल में भाग लिया।
4. चौपड़ पर जनसभा में भाषण दिया।
5. कॉलेज की लड़कियों को भी प्रेरित किया।
इस प्रकार एक आम परिवार की लड़की ने देश की आजादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाई।
🎯 MCQ — Board Exam 2026
Q1. एक कहानी यह भी की लेखिका कौन हैं?
- (a) महादेवी वर्मा
- (b) मन्नू भंडारी ✅ सही उत्तर
- (c) सुभद्रा कुमारी चौहान
- (d) अमृता प्रीतम
Q2. पिताजी ने रसोई को क्या कहा?
- (a) भोजनालय
- (b) भटियारखाना ✅ सही उत्तर
- (c) पाकशाला
- (d) रसोईघर
Q3. शीला अग्रवाल कौन थीं?
- (a) लेखिका की माँ
- (b) लेखिका की बहन
- (c) हिंदी की प्राध्यापिका ✅ सही उत्तर
- (d) पड़ोसी
Q4. पिताजी ने कौन सा शब्दकोश बनाया?
- (a) हिंदी-संस्कृत
- (b) अंग्रेजी-हिंदी विषयवार ✅ सही उत्तर
- (c) उर्दू-हिंदी
- (d) हिंदी-मराठी
Q5. लेखिका की बड़ी बहन का नाम क्या था?
- (a) सुमित्रा
- (b) सुशीला ✅ सही उत्तर
- (c) सुनीता
- (d) सविता
Q6. “अहंवादी” का क्या अर्थ है?
- (a) दयालु
- (b) शांत
- (c) घमंडी ✅ सही उत्तर
- (d) उदास
🎯 Board Exam 2026 — यह जरूर याद करें!
- लेखिका = मन्नू भंडारी | जन्म = 1931 | मध्य प्रदेश
- पति = राजेंद्र यादव | प्रमुख रचना = आपका बंटी, महाभोज
- पिताजी = शक्की + अहंवादी + प्रेरणादायक
- माँ = त्यागमयी + धैर्यशील + बेपढ़ी-लिखी
- रसोई = भटियारखाना (पिताजी का मानना)
- शीला अग्रवाल = साहित्य + राजनीतिक चेतना दी
- वजूद का एहसास = बहन-भाइयों के जाने के बाद
- हीन-भावना = बहन से तुलना के कारण
- इस Chapter से 10-12 नंबर के प्रश्न आते हैं
दोस्तों, एक कहानी यह भी पाठ हमें यह सिखाता है कि हमारा परिवार, हमारा मोहल्ला और हमारे अनुभव मिलकर हमें बनाते हैं। मन्नू भंडारी जी के जीवन की यह यात्रा हम सबको प्रेरणा देती है। कोई सवाल हो तो comment करें।
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