
नमस्कार साथियों आज हम इस पोस्ट में अध्याय 8 अनुवांशिकता के बारे में पढ़ेंगे।जो आपके एग्जाम की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है।
जब नए जीव पैदा होते हैं तो वे अपने माता-पिता जैसे होते हैं — लेकिन बिल्कुल एक जैसे नहीं। कुछ न कुछ फ़र्क ज़रूर होता है। यही विभिन्नता (Variation) है।
- अलैंगिक जनन — विभिन्नताएँ बहुत कम, DNA नकल में थोड़ी गलतियाँ
- लैंगिक जनन — विभिन्नताएँ अधिक, दो जनकों के DNA मिलते हैं
- विभिन्नताएँ जीव की उत्तरजीविता में मदद करती हैं
- पर्यावरण के अनुसार उत्तम परिवर्तन का प्राकृतिक चयन होता है
आनुवंशिकता के नियम सबसे पहले ग्रेगर जॉन मेंडल (1822-1884) ने दिए। उन्होंने मटर के पौधों पर लगभग 8 साल प्रयोग किए।
| लक्षण | प्रभावी | अप्रभावी |
|---|---|---|
| लंबाई | लंबा (T) | बौना (t) |
| बीज का रंग | पीला (Y) | हरा (y) |
| बीज का आकार | गोल (R) | झुर्रीदार (r) |
| फूल का रंग | बैंगनी | सफेद |
| फली का रंग | हरी | पीली |
| फली का आकार | भरी | संकुचित |
| फूल की स्थिति | अक्षीय | शीर्षस्थ |
अप्रभावी लक्षण — F₁ में छिप जाता है लेकिन F₂ में वापस आता है — जैसे बौनापन (t)।
कर्णपालि (ear lobe) का उदाहरण —
- स्वतंत्र कर्णपालि = प्रभावी लक्षण
- जुड़ी कर्णपालि = अप्रभावी लक्षण
लंबे (TT) × बौने (tt) पौधों का संकरण —
F₂ पीढ़ी = F₁ का स्वनिषेचन — 3 लंबे : 1 बौना
जीनोटाइप: TT : Tt : tt = 1 : 2 : 1
फीनोटाइप: लंबा : बौना = 3 : 1
दो लक्षणों का एक साथ अध्ययन — गोल पीले (RRYY) × झुर्रीदार हरे (rryy)
- प्रभाविता का नियम: F₁ पीढ़ी में केवल प्रभावी लक्षण दिखता है, अप्रभावी छिप जाता है।
- पृथक्करण का नियम: F₂ में प्रभावी और अप्रभावी 3:1 अनुपात में अलग होते हैं।
- स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम: दो लक्षण स्वतंत्र रूप से वंशागत होते हैं, F₂ में 9:3:3:1।
F₂ में — TT (25%) + Tt (50%) + tt (25%) → लंबे:बौने = 3:1।
उदाहरण — मटर की लंबाई:
- लंबाई → हॉर्मोन द्वारा नियंत्रित
- हॉर्मोन बनाने का काम → एंज़ाइम करता है
- एंज़ाइम बनाने की सूचना → जीन (DNA) में होती है
- अगर जीन में परिवर्तन → एंज़ाइम कम/ज़्यादा → लंबाई बदलती है
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| जीन (Gene) | DNA का वह भाग जो एक प्रोटीन बनाने की सूचना रखे |
| एलील (Allele) | एक जीन के विकल्पी रूप — जैसे T और t |
| जीनोटाइप | जीन की वास्तविक संरचना — जैसे TT, Tt, tt |
| फीनोटाइप | दिखने वाला लक्षण — लंबा या बौना |
| समयुग्मजी | दोनों एलील एक जैसे — TT या tt |
| विषमयुग्मजी | दोनों एलील अलग — Tt |
| गुणसूत्र | DNA का संगठित रूप — जिसमें जीन होते हैं |
जनन कोशिका (युग्मक) में केवल एक सेट।
निषेचन पर दोनों जनकों से एक-एक → फिर से दो सेट।
- स्त्री में गुणसूत्र — XX (दोनों X)
- पुरुष में गुणसूत्र — XY (एक X, एक Y)
- माता के सभी युग्मक X वाले होते हैं
- पिता के आधे X, आधे Y वाले
- X + X मिले → लड़की (XX)
- X + Y मिले → लड़का (XY)
- इसलिए बच्चे का लिंग पिता पर निर्भर — माँ पर नहीं!
Y गुणसूत्र X से छोटा होता है। इसीलिए पुरुष में एक जोड़ा पूर्ण नहीं होता।
📌 आपने क्या सीखा
- जनन में विभिन्नताएँ → DNA परिवर्तन → नए लक्षण
- आनुवंशिकता → माता-पिता से संतानों में लक्षण वंशागत
- मेंडल → मटर पर प्रयोग → प्रभावी-अप्रभावी लक्षण
- F₁ → सभी प्रभावी | F₂ → 3:1 अनुपात (फीनोटाइप)
- F₂ जीनोटाइप → 1:2:1 (TT:Tt:tt)
- द्विसंकर F₂ → 9:3:3:1 अनुपात
- जीन → DNA का भाग → प्रोटीन → लक्षण नियंत्रण
- लिंग निर्धारण → पिता के X या Y गुणसूत्र पर निर्भर
- स्त्री = XX | पुरुष = XY | कुल = 46 गुणसूत्र
CBSE Board Exam — Chapter 8: आनुवंशिकता
(a) TTWW (b) TTww (c) TtWW (d) TtWw
(d) TtWw — संतति में आधे बौने = Tt × tt → 50% लंबे, 50% बौने। सभी बैंगनी = W प्रभावी। अतः लंबे जनक = TtWw।
(a) प्रभावी (b) अप्रभावी (c) दोनों (d) कह नहीं सकते
(d) कह नहीं सकते — केवल इस जानकारी से प्रभावी/अप्रभावी का निर्धारण नहीं होता। इसके लिए विभिन्न लक्षणों वाले जनकों का संकरण और F₂ परिणाम देखना होगा।
(a) माँ के X गुणसूत्र से (b) पिता के X या Y गुणसूत्र से (c) दोनों के X से (d) माँ के Y से
(b) पिता के X या Y गुणसूत्र से — माँ के सभी युग्मक X वाले होते हैं। पिता से X मिले → XX = लड़की; Y मिले → XY = लड़का।
(a) AA (b) AO (c) OO (d) AB
(b) AO — पुत्री का रुधिर वर्ग ‘O’ (oo) है। माँ से ‘O’ मिला, पिता से भी ‘O’ मिला होगा। इसलिए पिता का जीनोटाइप AO (विषमयुग्मजी) था।
मेंडल ने लंबे × बौने मटर का संकरण कराया —
- F₁ पीढ़ी में सभी पौधे लंबे थे — बौनापन गायब हो गया
- इसलिए लंबाई प्रभावी और बौनापन अप्रभावी लक्षण
- F₂ में बौनापन वापस आ गया → सिद्ध हुआ कि अप्रभावी लक्षण खोया नहीं था, बस छिपा था
मेंडल ने द्विसंकर संकरण में गोल-पीले × झुर्रीदार-हरे का संकरण कराया —
- F₂ पीढ़ी में 9:3:3:1 का अनुपात मिला
- नए संयोजन मिले — गोल+हरे और झुर्रीदार+पीले (जो पहले नहीं थे)
- इससे सिद्ध हुआ कि बीज का रंग और आकार स्वतंत्र रूप से वंशागत होते हैं
- माँ में — XX गुणसूत्र → सभी युग्मक X वाले
- पिता में — XY गुणसूत्र → आधे X वाले, आधे Y वाले
- माँ का X + पिता का X → XX = लड़की
- माँ का X + पिता का Y → XY = लड़का
- संभावना — 50% लड़की, 50% लड़का
- अतः लिंग निर्धारण पिता पर निर्भर है, माँ पर नहीं
- विभिन्नताएँ जीवों को विभिन्न वातावरणों के अनुकूल बनाती हैं
- यदि तापमान अधिक हो → ऊष्मा सहन करने वाले जीव जीवित रहेंगे
- अनुकूल विभिन्नताएँ — अगली पीढ़ी में वंशागत होंगी
- प्राकृतिक चयन → उत्तम विभिन्नताओं का चयन
- यही जैव विकास का आधार है
प्रयोग: लंबे (TT) × बौने (tt) मटर का संकरण।
- P पीढ़ी: TT × tt → लंबा × बौना
- F₁ पीढ़ी: सभी Tt → सभी लंबे दिखते हैं (प्रभाविता का नियम)
- F₁ का स्वनिषेचन: Tt × Tt → F₂ पीढ़ी
- F₂ जीनोटाइप: TT : Tt : tt = 1 : 2 : 1
- F₂ फीनोटाइप: लंबे : बौने = 3 : 1
इसे पृथक्करण का नियम कहते हैं।
- हर कोशिका में जीन की दो प्रतियाँ (2 सेट) होती हैं
- जनन कोशिका (युग्मक) में केवल एक सेट — अर्धसूत्री विभाजन से
- नर युग्मक में एक सेट + मादा युग्मक में एक सेट
- निषेचन पर → फिर दो सेट बन जाते हैं
- अतः संतति को माँ से 50% + पिता से 50% जीन मिलते हैं
यही कारण है कि संतानों में माँ और पिता दोनों के लक्षण दिखते हैं।
प्रयोग:
- दो अलग-अलग रंग के कुत्तों का संकरण कराएँ (जैसे काला × सफेद)
- F₁ संतति के सभी पिल्लों का रंग देखें
- जो रंग सभी F₁ पिल्लों में दिखे → वही प्रभावी
- F₁ पिल्लों का आपस में संकरण कराएँ
- F₂ में 3:1 अनुपात — जो लक्षण 3 में → प्रभावी, जो 1 में → अप्रभावी
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