संघवाद अध्याय -2 परिचय
संघवाद ऐसी शासन व्यवस्था है जिसमें शक्तियां केंद्र और राज्य सरकारों के बीच संविधान द्वारा विभाजित होती है। दोनों स्तर अपनी -अपनी सीमाओं में स्वतंत्र रूप से कार्य करते है। भारत में संघवाद एकता और विविधता बनाए रखने का महत्वपूर्ण माध्यम है।
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संघवाद की परिभाषा
संघवाद शासन की वह व्यवस्था है जिसमें सत्ता का विभाजन केंद्रीय प्राधिकरण और विभिन्न घटक इकाइयों राज्यों प्रांतों के बीच इस प्रकार किया जाता है कि दोनों अपने-अपने क्षेत्र में स्वतंत्र होकर कार्य कर सके।
- संघवाद ऐसी शासन व्यवस्था है जिसमें सत्ता का विभाजन केंद्र और राज्यों के बीच होता है।
- दोनों स्तर की सरकारें अपने अपने क्षेत्र में स्वतंत्र होकर काम करती है।
- दोनों सरकारें एक ही नागरिक समूह पर शासन करती हैं।लेकिन उनके अधिकार अलग अलग होते है।

संघीय शासन की प्रमुख विशेषताएं
- दो या अधिक स्तर की सरकारें होती है।
- प्रत्येक स्तर की सरकार का अधिकार क्षेत्र संविधान द्वारा निर्धारित होता है।
- संविधान की सर्वोच्चता होती है।
- संविधान संशोधन की विशेष प्रक्रिया होती है।
- स्वतंत्र न्यायपालिका विवादों का निपटारा करती है।
- विभिन्न स्तर की सरकारों के पास राजस्व के अलग-अलग स्रोत होते हैं।
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संघवाद के प्रकार
- Coming Together Federation – स्वतंत्र राज्य मिलकर संघ बनाते हैं जैसे – अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया।
- Holding Together Federation – एक बड़ा देश अपनी शक्ति राज्यों में बांटता है। जैसे – भारत, स्पेन बेल्जियम।
भारत में संघवाद
भारत में संघवाद भारत एक संघीय देश है जिसमे शक्तियों का तीन स्तरों में बांटा गया है:
- केंद्र सरकार
- राज्य सरकार
- स्थानीय सरकार ( पंचायत/नगर पालिका )
शक्तियों का विभाजन तीन सूचियों में किया गया है:
- संघ सूची
- राज्य सूची
- समवर्ती सूची
संघवाद के उद्देश्य:
- राष्ट्रीय एकता बनाए रखना।
- क्षेत्रीय विविधताओं का सम्मान करना।
- लोकतंत्र को मजबूत बनाना।
भारत में संघीय व्यवस्था:
- भारत एक विशाल विविधताओं वाला देश है। ( भाषा,धर्म,क्षेत्र)
- स्वतंत्रता के बाद भारत ने संघीय शासन प्रणाली अपनाई।
- भारतीय संविधान में संघ शब्द का प्रयोग किया गया हैं।
- भारत का संघ राज्यों के समझौते से नही बना,बल्कि संविधान द्वारा स्थापित किया गया है।
शक्तियों का विभाजन
संघ सूची :
- राष्ट्रीय महत्व के विषय
- उदाहरण: रक्षा, विदेश नीति,बेकिंग,संचार,मुद्रा
राज्य सूची :
- राज्य स्तर के विषय
- उदाहरण: पुलिस, कृषि, व्यापार, वाणिज्य
समवर्ती सूची :
- ऐसे विषय जिन पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं।
- उदाहरण: शिक्षा, विवाह, वन, मजदूर, संघ ।
यदि संघ और राज्य के कानून में टकराव हो तो संघ का कानून मान्य होता है।
अवशिष्ट विषय :
जो विषय किसी भी सूची में नहीं है, उन पर कानून बनाने का अधिकार केंद्र सरकार को है।
विशेष प्रावधान :
- कुछ राज्यों को विशेष अधिकार दिए गए थे। जैसे अनुच्छेद 371
- उद्देश्य: उनकी संस्कृति सामाजिक पहचान और संसाधनों की रक्षा करना।
संविधान सशोधन :
- केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन आसानी से बदला नहीं जा सकता।
- संशोधन के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत आवश्यक है।
- कुछ संशोधन के लिए कम से कम आधे राज्यों की स्वीकृति जरूरी होती है।
न्यायपालिका की भूमिका :
- सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय विवादों का समाधान करते है।
- केंद्र और राज्य के बीच विवादों में अंतिम निर्णय न्यायपालिका का होता है।
वित्तीय व्यवस्था :
- सरकार चलाने के लिए कर लगाने और राजस्व जुटाने का अधिकार केंद्र और राज्य दोनों को है।
- राजस्व का बटवारा संविधान के अनुसार होता है।
संघीय व्यवस्था कैसे काम करती है?(How Does the Federal System Work?)
संघीय व्यवस्था वह शासन प्रणाली है। जिसमें शासन दो स्तरों के बीच बांटी जाती है।
1️⃣ केंद्रीय सरकार (Union Government)
2️⃣ राज्य सरकार (State Government)
दोनो स्तर की सरकारें संविधान के अनुसार अपने अपने अधिकारों का प्रयोग करती है।
संघीय व्यवस्था कैसे चलती है? महत्वपूर्ण NCERT POINT:
- संघीय व्यवस्था में दो या अधिक स्टार की सरकारी होती हैं। जैसे भारत में केंद्र सरकार, राज्य सरकार और स्थानीय सरकार इत्यादि।
- संघीय व्यवस्था में संविधान में शक्तियों का स्पष्ट विभाजन होता है। हर स्तर की सरकार को अलग-अलग विषयों पर कानून बनाने का अधिकार मिलता है।
- संघीय व्यवस्था में संविधान सर्वोच्च होता है। जिसमें केंद्र और राज्य दोनों को संविधान के नियमों के अनुसार ही काम करना पड़ता है।
- संघीय व्यवस्था में यह प्रावधान है कि संविधान को आसानी से बदला नहीं जा सकता है इसमें बदलाव के लिए केंद्र और राज्यों दोनों की सहमति बहुत ही जरूरी होती है।
- संघीय व्यवस्था में यह भी प्रावधान है, कि स्वतंत्र न्याय पालिका होगी। जिसमें केंद्र और राज्यों के बीच विवाद हो तो अदालत उसका समाधान करती है यानी इसका निर्णय सर्वोच्च न्यायालय देगा।
- राजस्व के स्रोत निर्धारित होते हैं। दोनों स्तर की सरकारों को अपने काम के लिए अलग-अलग कर वसूलने का अधिकार मिलता है।
- संघीय व्यवस्था में लोकतांत्रिक शासन को मजबूत बनाता है। इससे देश के अलग – अलग क्षेत्रों की जरूरतों के अनुसार शासन चलाया जा सकता है।
भाषाई राज्य
- भारत में राज्यों का गठन कई जगह भाषा के आधार पर किया गया।
- आजादी के बाद अलग-अलग क्षेत्र के लोगों ने अपनी भाषा के आधार पर राज्य बनाने की मांग की।
- 1950 के दशक में राज्यों की सीमाओं में बदलाव किया गया।
- उद्देश्य था कि एक ही भाषा बोलने वाले लोग एक ही राज्य में रहे।
- इससे प्रशासन चलाना और लोगों से संपर्क करना आसान हुआ।
- बाद में कुछ राज्य संस्कृति,भाषा और प्रशासनिक जरूरत के आधार पर बनाए गए।
- उदाहरण झारखंड,उत्तराखंड,छत्तीसगढ़ जैसे नए राज्य बनाए गए।
- भाषाई राज्यों से देश और अधिक एकजुट और मजबूत हुआ।
भाषा – नीति
- भारत में किसी एक भाषा को राष्ट्रभाषा नहीं बनाया गया।
- हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया।
- हिंदी के साथ अंग्रेजी का भी सरकारी में काम में उपयोग होता है।
- संविधान में 22 भाषाओं को अनुसूचित भाषा का दर्जा दिया गया है।
- केंद्र सरकार की नौकरियों में किसी भी भाषा में परीक्षा दी जा सकती है।
- राज्यों को अपनी राजभाषा चुनने का अधिकार है।
- इस नीति का उद्देश्य सभी भाषाओं का सम्मान और संरक्षण करना है।
केंद्र – राज्य संबंध
- भारत में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच अधिकारों का बंटवारा संविधान में तय किया गया है।
- कुछ विषय केंद्र सरकार के पास होते हैं जैसे – रक्षा,विदेश नीति।
- कुछ विषय राज्य सरकारों के पास होते हैं जैसे – पुलिस कृषि।
- कुछ विषयों पर केंद्र और राज्य दोनों मिलकर काम करते हैं।
- कई बार केंद्र और राज्य सरकारों में राजनीतिक मतभेद भी होते हैं।
- फिर भी दोनों का उद्देश्य देश का विकास और प्रशासन चलाना होता है।
- अच्छे केंद्र- राज्य संबंध से देश का शासन बेहतर चलता है।
भारत में विकेंद्रीकरण(Decentralisation in India)
➡️विकेंद्रीकरण क्या है?
- जब सत्ता केंद्र और राज्य सरकारों से लेकर स्थानीय सरकारों को दी जाती है तो इसे विकेंद्रीकरण कहते हैं।
- भारत एक विशाल देश है यहां हर समस्या का समाधान दिल्ली या राज्य की राजधानी से नहीं हो सकता।
- स्थानीय लोग अपनी समस्याओं को बेहतर समझते हैं और उनके समाधान में सीधे भाग ले सकते हैं।
- विकेंद्रीकरण से लोकतंत्र की जड़े मजबूत होती हैं।
➡️1992 का संविधान संशोधन
- 1992 में भारतीय संविधान में एक बड़ा बदलाव किया गया।
- स्थानीय स्वशासी निकायों को संवैधानिक दर्जा दिया गया।
- 73वाँ संशोधन – ग्रामीण क्षेत्रों के लिए पंचायती राज।
- 74वाँ संशोधन – शहरी क्षेत्रों के लिए नगर पालिका संस्थाएं।
- इन संशोधनों से स्थानीय सरकार को तीसरे स्तर की सरकार का दर्जा मिला
पंचायती राज व्यवस्था (ग्रामीण क्षेत्र)
पंचायती राज व्यवस्था में तीन स्तर की सरकारी होती हैं।जो निम्न है –
- ग्राम पंचायत -गांव या गांव के समूह के लिए ग्राम पंचायत होती है।
- पंचायत समिति -कुछ ग्राम पंचायत को मिलकर पंचायत समिति बनती है।
- जिला परिषद -जिला स्तर पर जिला परिषद होती है।
मुख्य बातें:
- ग्राम सभा गांव की सभी मतदाताओं की सभा, यह पंचायत की बैठकों में भाग लेती है।
- स्थानीय निकायों के चुनाव नियमित रूप से होने आवश्यक हैं।
- अनुसूचित जाति जनजाति और महिलाओं के लिए सीटे आरक्षित हैं।
- कम से कम एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं।
- कुछ राज्यों में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण भी है।
- राज्य चुनाव आयोग चुनाव की देखरेख करता है।
शहरी स्थानीय निकाय (नगर पालिका)
- नगर पंचायत – कस्बों के लिए।
- नगर पालिका परिषद – छोटे शहरों के लिए।
- नगर निगम (Municipal Corporation)-बड़े शहरों के लिए।
- इन सब का प्रमुख अध्यक्ष या मेयर होता है।
विकेंद्रीकरण की सीमाएं /कमजोरियां:
- राज्य सरकारें अक्सर पर्याप्त शक्तियां और धन स्थानीय निकायों को नहीं देती है।
- अनेक कार्य अभी भी राज्य सरकार के अधिकारियों द्वारा किए जाते हैं।
- स्थानीय निकायों के पास अपनी स्वयं के राजस्व की कमी है।
- चुनाव तो होते हैं परंतु वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति कम है।
महत्वपूर्ण तथ्य (At a Glance):
| विषय | तथ्य |
| 73 व संशोधन | पंचायती राज ग्रामीण |
| 74वां संशोधन | नगर पालिका शहरी |
| संशोधन वर्ष | 1992 |
| महिला आरक्षण | न्यूनतम 1/3 |
| स्तर | ग्राम – मंडल – जिला |
| निगरानी | राज्य चुनाव आयोग |
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